मुजफ्फरपुर में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लाखों रुपये की साइबर ठगी करने वाले गिरोह का पुलिस ने पर्दाफाश किया है। बांका से गिरफ्तार प्रिंस कुमार के बैंक खाते से 9 राज्यों में हुई ठगी के तार जुड़े मिले हैं। पुलिस अब गिरोह के बाकी सदस्यों की तलाश में जुटी है।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 3.47 लाख की ठगी
मुजफ्फरपुर में साइबर अपराधियों ने खुद को सीबीआई और पुलिस अधिकारी बताकर एक महिला को निशाना बनाया। आरोपियों ने 14 और 15 जुलाई को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्हाट्सऐप नंबरों से रागिनी देवी को फोन किया। जांच एजेंसियों के नाम पर डराया-धमकाया और डिजिटल अरेस्ट का झांसा देकर उनसे 3,47,999 रुपये ठग लिए।
इस मामले में साइबर थाना कांड संख्या 140/26 दर्ज किया गया था। घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने विशेष टीम बनाकर जांच शुरू की।
तकनीकी जांच से खुला साइबर ठगी का नेटवर्क
वरीय पुलिस अधीक्षक कांतेश कुमार मिश्रा के निर्देश पर गठित टीम ने तकनीकी साक्ष्यों और बैंक खातों की जांच शुरू की। जांच के दौरान ऐसे म्यूल अकाउंट सामने आए, जिनके जरिए ठगी की रकम को अलग-अलग खातों में भेजा जा रहा था।
इसी जांच में गिरोह के तार उत्तर प्रदेश के देवरिया तक पहुंचे। पुलिस ने बरियारपुर में छापेमारी कर पहले दीपू कुशवाहा को गिरफ्तार किया था। इसके बाद जांच में बांका निवासी प्रिंस कुमार के खाते में ठगी की रकम भेजे जाने की जानकारी मिली।
बांका से प्रिंस कुमार गिरफ्तार
पुलिस ने जानकारी मिलने के बाद बांका में छापेमारी की और प्रिंस कुमार को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक, प्रिंस ने अलग-अलग राज्यों में साइबर ठगी से जुड़े 14 लोगों की रकम अपने बैंक खाते में मंगाई थी।

उसके खाते में साइबर फ्रॉड से जुड़ी 2,64,748 रुपये की रकम फ्रीज कराई गई है। पुलिस अब इस राशि को पीड़िता के खाते में वापस कराने की कानूनी प्रक्रिया पूरी कर रही है।
9 राज्यों में पहले से दर्ज हैं 14 साइबर शिकायतें
जांच के दौरान प्रिंस के खिलाफ बड़ा रिकॉर्ड सामने आया। पुलिस के अनुसार उसके बैंक खाते से जुड़े 9 अलग-अलग राज्यों में कुल 14 साइबर शिकायतें पहले से दर्ज हैं। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि आरोपी किसी छोटे गिरोह का हिस्सा नहीं, बल्कि व्यापक साइबर ठगी नेटवर्क से जुड़ा हुआ था।
बाकी आरोपियों की तलाश जारी
मुजफ्फरपुर पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश में संभावित ठिकानों पर लगातार छापेमारी कर रही है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि ठगी की रकम किन-किन खातों में भेजी जाती थी और इस पूरे नेटवर्क को कौन संचालित कर रहा था।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बढ़ते अपराध से रहें सतर्क
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर अपराधी अक्सर पुलिस, सीबीआई या अन्य जांच एजेंसियों का अधिकारी बनकर लोगों को डराते हैं। ऐसे मामलों में किसी भी व्यक्ति को फोन पर पैसे ट्रांसफर नहीं करने चाहिए। संदिग्ध कॉल आने पर आधिकारिक माध्यम से संबंधित एजेंसी से संपर्क करना और तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत करना जरूरी है।
मुजफ्फरपुर का यह मामला दिखाता है कि साइबर ठगी का नेटवर्क कितना बड़ा और संगठित हो सकता है। एक बैंक खाते से जुड़े रिकॉर्ड ने पुलिस को कई राज्यों तक फैले नेटवर्क की कड़ी तक पहुंचा दिया है। अब असली चुनौती इस पूरे गिरोह के बाकी चेहरों को सामने लाने की है।

