गौतमबुद्ध नगर की दादरी विधानसभा सीट लंबे समय से पश्चिमी यूपी की दिलचस्प सियासी सीटों में गिनी जाती है। यहां सत्ता कई बार बदली, लेकिन सपा और कांग्रेस जीत का स्वाद नहीं चख सकीं। 2027 में BJP के सामने लगातार तीसरी जीत दर्ज करने की चुनौती होगी।
1991 में जनता दल का दबदबा
दादरी के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो 1991 में जनता दल के महेंद्र सिंह भाटी ने लगातार तीसरी बार जीत हासिल की थी। इसके बाद 1993 में भी जनता दल के समीर भाटी विजयी रहे। हालांकि, इस चुनाव में मुकाबला काफी करीबी रहा और जीत का अंतर सिर्फ 3,216 वोट था।
1996 में BJP ने बदला समीकरण
1996 के चुनाव में दादरी की राजनीति ने करवट ली। BJP के नवाब सिंह नागर ने कांग्रेस के लखीराम को 21,800 वोटों से हराकर पहली बार पार्टी को यहां जीत दिलाई। इसके बाद 2002 में भी नवाब सिंह नागर ने लगातार दूसरी बार सीट अपने नाम की।
BSP ने बनाई अपनी मजबूत पकड़
2007 में प्रदेश में चली BSP की लहर का असर दादरी में भी दिखाई दिया। सत्यवीर सिंह गुर्जर ने BJP के नवाब सिंह नागर को 24,423 वोटों से हराया। 2012 में भी सत्यवीर सिंह गुर्जर ने जीत दोहराई और BSP को लगातार दूसरी बार दादरी में सत्ता दिलाई।

2017 से फिर BJP के नाम सीट
2017 में BJP ने दादरी में शानदार वापसी की। तेजपाल सिंह नागर ने BSP के सत्यवीर सिंह गुर्जर को 80,177 वोटों के बड़े अंतर से हराया। इसके बाद 2022 में भी तेजपाल सिंह नागर ने जीत बरकरार रखी।
2022 में BJP उम्मीदवार को 2,18,068 वोट मिले, जबकि सपा के राजकुमार भाटी 79,850 वोटों पर रहे। जीत का अंतर 1,38,218 वोट रहा, जो दादरी के चुनावी इतिहास में सबसे बड़े अंतर में शामिल है।
सपा और कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती
1991 से 2022 के बीच हुए आठ चुनावों में BJP ने चार, जबकि जनता दल और BSP ने दो-दो बार जीत दर्ज की। इस पूरे दौर में सपा और कांग्रेस दादरी विधानसभा सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकीं।
यही आंकड़ा 2027 के चुनाव को विपक्ष के लिए चुनौतीपूर्ण बनाता है। हालांकि, चुनाव में पुराने आंकड़े हमेशा भविष्य की गारंटी नहीं होते। उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और गठबंधन का असर समीकरण बदल सकता है।
गुर्जर वोटर होंगे अहम?
दादरी की राजनीति में गुर्जर मतदाताओं को महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि प्रमुख दल अक्सर इस सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर उम्मीदवारों का चयन करते रहे हैं।
2027 में BJP के सामने जहां अपनी लगातार तीसरी जीत दर्ज करने की चुनौती होगी, वहीं सपा-कांग्रेस संभावित गठबंधन के जरिए मुकाबले को मजबूत करने की कोशिश कर सकते हैं। BSP भी अलग रणनीति के साथ मैदान में उतरती है तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।
दादरी में 2027 की लड़ाई सिर्फ एक सीट की नहीं होगी, बल्कि यह BJP के मजबूत आधार, विपक्षी एकजुटता और स्थानीय सामाजिक समीकरणों की परीक्षा भी होगी। आखिर गुर्जर वोटर किस ओर जाएंगे और जनता स्थानीय मुद्दों पर क्या फैसला करेगी, यही तय करेगा कि दादरी में BJP की हैट्रिक बनती है या 2027 में कोई नया सियासी अध्याय लिखा जाता है।

