दिवाली से पहले पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। अदालत ने साफ संकेत दिया कि न तो पटाखों पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग स्वीकार की जाएगी और न ही पूरे दिन बेरोकटोक इस्तेमाल की अनुमति होगी। अब तय समय और नियमों पर जोर है।
धार्मिक भावनाएं और स्वास्थ्य दोनों अहम
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से धार्मिक भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं, जबकि 24 घंटे पटाखे चलाने की अनुमति से बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों समेत अन्य जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अदालत ने दोनों पहलुओं के बीच संतुलन बनाने की जरूरत बताई।
मामला तीन बच्चों की याचिका से जुड़ा
सुनवाई Arjun Gopal मामले में हो रही है। इस मामले में पटाखों से होने वाले वायु और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों को लेकर याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट पहले भी पटाखों के इस्तेमाल को लेकर स्वास्थ्य, पर्यावरण और आजीविका से जुड़े हितों के बीच संतुलित नियामक व्यवस्था पर जोर दे चुका है।

लड़ी वाले पटाखों पर भी चर्चा
बुधवार की सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से कुछ शर्तों के साथ नई पीढ़ी के लड़ी वाले पटाखों के इस्तेमाल का प्रस्ताव रखा गया। इसमें पटाखों की संख्या, शेल का आकार और लगातार होने वाले धमाकों के बीच अंतराल जैसी शर्तें शामिल हैं।
सरकार ने पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने के लिए परीक्षणों का भी प्रस्ताव रखा है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों के उत्सर्जन को लेकर वैज्ञानिक परीक्षणों और नियामक मानकों पर भी विचार किया है।
2018 से चली आ रही पाबंदियों का संदर्भ
पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का नियामक रुख नया नहीं है। 23 अक्टूबर 2018 के Arjun Gopal फैसले में अदालत ने ग्रीन पटाखों और उनके इस्तेमाल को लेकर कड़े नियमन की व्यवस्था पर जोर दिया था। बाद के मामलों में दिल्ली-NCR की गंभीर वायु गुणवत्ता को देखते हुए अलग-अलग समय पर सख्त प्रतिबंध भी लगाए गए।
दिल्ली-NCR का मामला अलग
इस सुनवाई में दिल्ली-NCR के लिए पटाखों से जुड़े अलग प्रतिबंधों पर तत्काल फैसला नहीं किया गया। इस क्षेत्र से जुड़ा मुद्दा M.C. Mehta मामले में अलग से विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेशों में दिल्ली के साथ NCR के संबंधित हिस्सों में भी पटाखों पर नियमन लागू करने का संदर्भ मौजूद है।
अब नजर तय समय और नियमों पर
अदालत के रुख से संकेत मिलता है कि इस साल बहस का केंद्र केवल “पटाखे चलें या नहीं” तक सीमित नहीं रहेगा। इस्तेमाल का समय, पटाखों की किस्म, उनकी संख्या, ध्वनि और उत्सर्जन जैसे मानक भी महत्वपूर्ण होंगे।
दिवाली की परंपरा और साफ हवा—दोनों को साथ रखने की कोशिश अब अदालत के सामने है। अंतिम व्यवस्था क्या होगी, यह आगे के आदेशों से स्पष्ट होगा। फिलहाल संदेश साफ है: उत्सव की अनुमति हो सकती है, लेकिन उसके साथ स्वास्थ्य और पर्यावरण की जिम्मेदारी भी जुड़ी रहेगी।

