चुनाव आयोग की भूमिका और उसकी जवाबदेही को लेकर चल रही बहस के बीच 2023 का एक कानूनी प्रावधान फिर चर्चा में है। इस कानून की धारा 16 CEC और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामों से जुड़े सिविल और क्रिमिनल मामलों में विशेष सुरक्षा देती है। इसकी संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है।
धारा 16 में क्या कहा गया है?
Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 16 में CEC और चुनाव आयुक्तों के लिए कानूनी संरक्षण का प्रावधान है। इसके तहत किसी मौजूदा या पूर्व CEC या चुनाव आयुक्त के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्य निभाते हुए किए गए किसी काम, फैसले या कही गई बात को लेकर सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही अदालत में स्वीकार या जारी नहीं की जा सकती। यह प्रावधान पद छोड़ने के बाद भी लागू रहता है।
राहुल गांधी ने उठाया मुद्दा
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसी प्रावधान का हवाला देते हुए CEC ज्ञानेश कुमार की कानूनी सुरक्षा का मुद्दा उठाया है। उनके बयान का संदर्भ चुनावी प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग की जवाबदेही को लेकर चल रही राजनीतिक बहस से है।
हालांकि, धारा 16 किसी एक व्यक्ति के लिए बनाया गया प्रावधान नहीं है। यह कानून में CEC और सभी चुनाव आयुक्तों पर लागू होता है। इसलिए इसे समझते समय व्यक्ति के बजाय कानून की भाषा और दायरे को देखना जरूरी है।
जजों को मिलने वाली सुरक्षा से कितना अलग?
जजों के लिए भी न्यायिक कार्यों से संबंधित कानूनी संरक्षण मौजूद है। Judges (Protection) Act, 1985 न्यायिक रूप से कार्य करने वाले जजों को अतिरिक्त सुरक्षा देता है।
हालांकि, CEC की धारा 16 और न्यायाधीशों की सुरक्षा की कानूनी व्यवस्था एक जैसी नहीं है। न्यायिक संरक्षण का अपना अलग वैधानिक ढांचा है, जबकि CEC और चुनाव आयुक्तों की मौजूदा सुरक्षा सीधे 2023 के कानून की धारा 16 से आती है।
भ्रष्टाचार के मामलों का क्या?
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। CEC Act की धारा 16 की भाषा आधिकारिक ड्यूटी से जुड़े किसी act, thing or word के संबंध में सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही को रोकने की बात करती है। दूसरी ओर, जजों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों और भ्रष्टाचार संबंधी कानूनों का अपना अलग ढांचा है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि CEC को हर प्रकार के संभावित अपराध से अलग किसी सामान्य कानून के तहत सार्वभौमिक छूट मिली हुई है। धारा 16 की व्याख्या और इसकी संवैधानिक सीमा अदालत के सामने महत्वपूर्ण सवाल हैं।

सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने NGO Lok Prahari की याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था। याचिका में धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। अदालत ने फिलहाल इस प्रावधान पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन यह जांचने पर सहमति जताई कि इस तरह की कानूनी सुरक्षा संवैधानिक व्यवस्था के तहत दी जा सकती है या नहीं।
अब नजर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या पर
फिलहाल धारा 16 कानून का हिस्सा है और लागू है। लेकिन इसकी संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती लंबित है। इसलिए इस मुद्दे पर अंतिम स्थिति अदालत के फैसले के बाद ही स्पष्ट होगी।
CEC की स्वतंत्रता और चुनावी संस्थाओं की जवाबदेही के बीच संतुलन लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम सवाल है। आने वाली न्यायिक सुनवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि आधिकारिक कार्यों के लिए दी गई यह सुरक्षा संविधान की कसौटी पर कितनी टिकती है।

