तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर भाषा और पहचान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। अभिनेता से राजनेता बने विजय के नेतृत्व वाली सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में राज्य गीत ‘तमिल थाई वजथु’ को सबसे आखिर में बजाए जाने पर राजनीतिक बवाल शुरू हो गया है। गुरुवार को 23 विधायकों के मंत्री पद की शपथ के दौरान सबसे पहले ‘वंदे मातरम’ फिर राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और अंत में तमिल प्रार्थना गीत बजाया गया। जैसे ही यह क्रम सामने आया विपक्षी दलों और तमिल संगठनों ने इसे तमिल अस्मिता का अपमान बताते हुए सरकार को घेरना शुरू कर दिया। खास बात यह रही कि इससे पहले 10 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ के दौरान भी यही क्रम अपनाया गया था। उस समय भी विवाद उठा था और सरकार ने भविष्य में सुधार का संकेत दिया था। लेकिन दोबारा वही स्थिति बनने के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर लोगों के बीच बहस तेज हो गई है और कई यूजर्स ने इसे तमिल संस्कृति की अनदेखी करार दिया है।
गवर्नर कार्यालय पर फूटा सारा ठीकरा
विवाद बढ़ने के बाद तमिलगा वेट्री कजगम ने इस पूरे मामले की जिम्मेदारी गवर्नर कार्यालय पर डाल दी। पार्टी नेताओं का कहना है कि समारोह का आयोजन लोक भवन की देखरेख में हुआ था और गीतों का क्रम भी वहीं से तय किया गया था। पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया कि विधानसभा के आधिकारिक कार्यक्रमों में हमेशा तमिल गान सबसे पहले ही बजाया जाएगा। टीवीके नेताओं ने केंद्र सरकार के एक पुराने सर्कुलर का हवाला देते हुए दावा किया कि राज्यपाल कार्यालय ने उसी के आधार पर यह फैसला लिया। पार्टी नेता नांजिल संपत ने कहा कि सरकार तमिल भाषा और संस्कृति के सम्मान के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और इस मामले को बेवजह राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। हालांकि विपक्ष इस सफाई से संतुष्ट नजर नहीं आया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय की पार्टी अभी नई है और ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर छोटी चूक भी बड़ा राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकती है। तमिलनाडु की राजनीति में भाषा और क्षेत्रीय पहचान हमेशा बेहद भावनात्मक विषय रहे हैं और यही वजह है कि यह मामला तेजी से तूल पकड़ता जा रहा है।

विपक्षी दलों ने सरकार पर बोला बड़ा हमला
मुख्य विपक्षी दल DMK ने इस मुद्दे पर विजय सरकार को सीधे निशाने पर ले लिया है। DMK प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव के समय तमिल हितों की रक्षा करने का वादा करने वाली सरकार अब खुद तमिल परंपराओं को कमजोर कर रही है। वहीं CPI और कांग्रेस ने भी इस घटना को गंभीर बताया है। CPI सचिव एम वीरपांडियन ने इसे स्थापित परंपरा का उल्लंघन करार देते हुए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। कांग्रेस सांसद एस जोतिमणि ने कहा कि तमिलनाडु में राज्य गीत सिर्फ एक औपचारिकता नहीं बल्कि लोगों की भावनाओं और सम्मान का प्रतीक है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी राज्यपाल के जरिए तमिल राजनीति में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर MDMK महासचिव वाइको ने ‘वंदे मातरम’ को राज्य सरकार के कार्यक्रमों में शामिल किए जाने का खुलकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के सरकारी समारोहों में सबसे पहले ‘तमिल थाई वजथु’ और उसके बाद ही राष्ट्रगान बजना चाहिए। इस बयान के बाद विवाद और तेज हो गया है।
तमिल पहचान की राजनीति फिर बनी चुनावी मुद्दा
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि तमिलनाडु में भाषा और सांस्कृतिक पहचान की राजनीति कितनी मजबूत है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की राजनीति में बड़ा चुनावी हथियार बन सकता है। विजय की पार्टी जहां खुद को तमिल गौरव की नई आवाज बताने की कोशिश कर रही है वहीं विपक्ष उसे इसी मुद्दे पर घेरने में जुट गया है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर सरकार इस विवाद को जल्द शांत नहीं कर पाई तो इसका असर जनता के बीच उसकी छवि पर पड़ सकता है। सोशल मीडिया पर भी तमिल गान को लेकर लोगों की भावनाएं खुलकर सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे प्रोटोकॉल की गलती बता रहे हैं तो कुछ इसे तमिल संस्कृति को कमजोर करने की साजिश मान रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि मुख्यमंत्री विजय इस विवाद पर खुद क्या रुख अपनाते हैं और क्या सरकार भविष्य में ऐसे आयोजनों के लिए नया प्रोटोकॉल तय करेगी। फिलहाल यह मामला तमिलनाडु की राजनीति में नई बहस और नए टकराव की वजह बन चुका है।

