उत्तर प्रदेश की राजनीति में बिजनौर एक ऐसा जिला है जहां चुनाव जीतने के लिए सिर्फ पार्टी का नाम काफी नहीं होता है यहां गन्ना किसानों के मुद्दे और अलग अलग समाजों के वोट भी चुनाव का रुख बदल सकते हैं आने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए बिजनौर की राजनीति पर सबकी नजर बनी हुई है
बिजनौर की पहचान गन्ने की खेती और चीनी मिलों से भी है यहां बड़ी संख्या में किसान गन्ने की खेती करते हैं ऐसे में गन्ने का सही दाम समय पर भुगतान खेती की बढ़ती लागत और सिंचाई जैसे मुद्दे किसानों के लिए काफी अहम हैं चुनाव के समय राजनीतिक दलों को इन सवालों का जवाब देना पड़ता है क्योंकि गांवों में रहने वाले किसानों का फैसला कई सीटों पर जीत और हार का अंतर तय कर सकता है
बिजनौर की राजनीति में जातीय समीकरण भी काफी मायने रखते हैं यहां मुस्लिम दलित जाट सैनी गुर्जर और दूसरे समुदायों के मतदाता अलग अलग इलाकों में चुनावी तस्वीर को प्रभावित करते हैं हालांकि किसी एक समुदाय का वोट किस पार्टी को मिलेगा यह हर चुनाव में एक जैसा नहीं रहता है उम्मीदवार की छवि स्थानीय मुद्दे और पार्टी की पकड़ भी मतदाताओं के फैसले पर असर डालते हैं
जिले में कुल आठ विधानसभा सीटें हैं और पिछले चुनावों के नतीजे बताते हैं कि यहां मुकाबला लगातार बदलता रहा है 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने छह सीटें जीती थीं जबकि 2022 में बीजेपी और समाजवादी पार्टी ने चार चार सीटों पर जीत हासिल की थी इससे साफ है कि बिजनौर में किसी भी पार्टी के लिए सभी सीटों पर अपनी पकड़ बनाए रखना आसान नहीं है
AajTak
लोकसभा चुनाव में भी बिजनौर और नगीना सीट पर अलग अलग नतीजे देखने को मिले थे 2024 में बिजनौर सीट पर राष्ट्रीय लोक दल के चंदन चौहान जीते जबकि नगीना से चंद्रशेखर आजाद ने जीत दर्ज की थी इन नतीजों ने जिले की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी
AajTak
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले चुनाव में गन्ना किसानों की नाराजगी जातीय समीकरण और राजनीतिक दलों की रणनीति किस तरह काम करेगी बिजनौर में जीत का रास्ता किसके लिए आसान होगा और किसे कड़ी चुनौती मिलेगी इसका जवाब चुनाव के दौरान मतदाताओं के फैसले से ही सामने आएगा

