राम मंदिर के कथित चढ़ावा (दान) अनियमितता मामले को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति लगातार गरमाई हुई है। समाजवादी पार्टी इस मुद्दे पर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को घेर रही है। इसी बीच RSS के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार के बयान के बाद सियासी बयानबाजी और तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज काका ने इंद्रेश कुमार के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कई सवाल खड़े किए हैं।
इंद्रेश कुमार के बयान पर सपा की प्रतिक्रिया
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज काका ने कहा कि “इंद्रेश कुमार कौन होते हैं यह तय करने वाले कि कौन किस मुद्दे पर बोलेगा और कौन नहीं?” उन्होंने आरोप लगाया कि RSS किसी राजनीतिक या सामाजिक मुद्दे पर दूसरों को उपदेश देने की स्थिति में नहीं है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम किसी एक संगठन या राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि पूरे देश और करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र हैं।
RSS की फंडिंग पर उठाए सवाल
मनोज काका ने RSS के वित्तीय संसाधनों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देशभर में संगठन के बड़े-बड़े कार्यालय बनाए जा रहे हैं और यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इसके लिए धन कहां से आता है।

उन्होंने मांग की कि यदि संगठन चंदा लेता है तो चंदा देने वालों और फंडिंग के स्रोतों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
“राम मंदिर मुद्दे पर बोलने का सभी को अधिकार”
सपा प्रवक्ता ने कहा कि यदि किसी धार्मिक स्थल या सार्वजनिक संस्था से जुड़ा कोई विवाद सामने आता है तो उस पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव जनता और श्रद्धालुओं से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाते रहेंगे और कोई संगठन यह तय नहीं कर सकता कि कौन क्या बोले।
उन्होंने आरोप लगाया कि राम मंदिर से जुड़े कथित दान विवाद में जवाबदेही तय होनी चाहिए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
आखिर क्या बोले थे इंद्रेश कुमार?
दरअसल, RSS के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार ने छत्तीसगढ़ के रायपुर में राम मंदिर विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि अयोध्या की महिमा सदियों से रही है और आगे भी बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि इस विषय पर राजनीतिक बयानबाजी नहीं होनी चाहिए और नेताओं को इसे राजनीति के बजाय श्रद्धा और आस्था के दृष्टिकोण से देखना चाहिए।
राम मंदिर विवाद पर जारी है सियासी टकराव
राम मंदिर के कथित चढ़ावा विवाद को लेकर उत्तर प्रदेश में सियासी आरोप-प्रत्यारोप लगातार तेज हो रहे हैं। एक ओर विपक्ष सरकार और मंदिर प्रबंधन से पारदर्शिता की मांग कर रहा है, वहीं सत्तापक्ष इन आरोपों को राजनीतिक हमला बता रहा है। मामले की जांच और उससे जुड़े घटनाक्रम पर सभी दलों की नजर बनी हुई है।

