रायसीना डायलॉग 2026 के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी जहाज को भारत में प्रवेश देने के फैसले के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस निर्णय में कानूनी पहलुओं के साथ-साथ मानवता को भी ध्यान में रखा गया। ईरान की ओर से भारत को संदेश मिला था कि उनका एक जहाज, जो भारतीय समुद्री सीमा के पास था, किसी समस्या का सामना कर रहा है और वह भारतीय बंदरगाह में आना चाहता है। 1 मार्च को भारत ने इस जहाज को आने की अनुमति दी, जो कुछ दिनों बाद कोच्चि बंदरगाह पर सुरक्षित पहुंचा।
जहाज में युवा कैडेट और मिशन की चुनौती
विदेश मंत्री जयशंकर ने बताया कि जहाज में कई युवा कैडेट भी सवार थे। जहाज एक फ्लीट रिव्यू में भाग लेने निकला था, लेकिन रास्ते में हालात अचानक बदल गए और वह मुश्किल स्थिति में फंस गया। उन्होंने श्रीलंका के उदाहरण का भी जिक्र किया, जहाँ एक जहाज अपने तय मिशन में सफल नहीं हो पाया था। जयशंकर ने कहा कि भारत ने इस मामले को मानवता के नजरिए से देखा और उसी आधार पर निर्णय लिया। उनका मानना है कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी और नैतिकता के अनुरूप सही था।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और हिंद महासागर की स्थिति
जयशंकर ने अपने भाषण में अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि भारत UNCLOS और अंतरराष्ट्रीय कानून के समर्थन में खड़ा है। विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया पर चल रही बहस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि लोगों को हिंद महासागर की वास्तविक स्थिति को समझना चाहिए। उन्होंने डिएगो गार्सिया को उदाहरण बताया, जो पिछले करीब पांच दशकों से हिंद महासागर में सैन्य ठिकाना है। इसके अलावा ज़िबूटी में विदेशी सैन्य मौजूदगी और हंबनटोटा बंदरगाह के विकास का भी जिक्र किया।
क्षेत्रीय सुरक्षा और सही नजरिए की आवश्यकता
जयशंकर ने स्पष्ट किया कि हिंद महासागर क्षेत्र में कई देशों की मौजूदगी और गतिविधियां लंबे समय से चल रही हैं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र की राजनीतिक और सैन्य स्थिति को समझने के लिए सही दृष्टिकोण की जरूरत है। भारत के निर्णय को केवल राजनीतिक लाभ या आलोचना की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। विदेश मंत्री का कहना था कि अंतरराष्ट्रीय कानून, सुरक्षा और मानवता के संतुलन को ध्यान में रखते हुए भारत ने जहाज को सुरक्षित प्रवेश दिया।

