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Wednesday, September 16, 2026
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जेवर एयरपोर्ट पर उतरे रूसी विमान, दुनिया के सामने आया UP का नया एविएशन हब

BRICS Summit 2026 ने दिल्ली को वैश्विक कूटनीति के केंद्र में रखा, लेकिन इसका एक अहम असर उत्तर प्रदेश के जेवर में भी दिखाई दिया। समिट से पहले रूस के तीन सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरे।

बताया गया कि इन विमानों से रूस की एडवांस टीम और सुरक्षा से जुड़े लोग पहुंचे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेवर एयरपोर्ट पर किसी विदेशी विमान की यह पहली लैंडिंग थी। कुछ ही महीने पहले शुरू हुए एयरपोर्ट के लिए यह एक महत्वपूर्ण ऑपरेशनल उपलब्धि मानी जा रही है।

अभी नियमित इंटरनेशनल पैसेंजर फ्लाइट का इंतजार

जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन मार्च 2026 में हुआ था। इसकी शुरुआती क्षमता सालाना करीब 1.2 करोड़ यात्रियों को संभालने की बताई गई है। फिलहाल यहां घरेलू उड़ानों का संचालन हो रहा है।

ऐसे में रूसी विमानों का उतरना जेवर के लिए एक बड़ा टेस्ट जरूर है। एयरपोर्ट ने डिप्लोमैटिक और सुरक्षा से जुड़ी बड़ी उड़ानों को संभालने की क्षमता दिखाई है, लेकिन नियमित अंतरराष्ट्रीय यात्री उड़ानें शुरू होना अभी बाकी है।

यानी जेवर ऑपरेशनल स्तर पर अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों को संभालने की क्षमता दिखा चुका है, लेकिन कमर्शियल इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनने का सफर अभी पूरा नहीं हुआ है।

BRICS के लिए जेवर क्यों हो सकता है अहम?

BRICS में दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। भारत की अध्यक्षता में सप्लाई चेन, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग, दवा और दूसरे रणनीतिक क्षेत्रों में व्यापार और सहयोग बढ़ाने पर जोर है।

जेवर एयरपोर्ट पर उतरे रूसी विमान, दुनिया के सामने आया UP का नया एविएशन हब

ऐसे में जेवर की भूमिका केवल यात्रियों तक सीमित नहीं रहेगी। एयरपोर्ट के आसपास YEIDA क्षेत्र में बड़ा औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित किया जा रहा है। कार्गो, सेमीकंडक्टर, मेडिकल डिवाइस और एविएशन सेक्टर से जुड़ी परियोजनाएं इस क्षेत्र को नई पहचान दे सकती हैं।

22 हजार वर्ग मीटर का वेयरहाउस, कार्गो पर बड़ा दांव

जेवर एयरपोर्ट के कार्गो टर्मिनल में करीब 22 हजार वर्ग मीटर का वेयरहाउस बताया गया है। इसकी शुरुआती क्षमता हर साल करीब 2 लाख टन माल संभालने की बताई गई है।

इस क्षमता का मतलब है कि भविष्य में जेवर से केवल यात्रियों की आवाजाही नहीं होगी। चिप, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल उपकरण, कलपुर्जे और अन्य हाई-वैल्यू सामान को भी देश और दुनिया के अलग-अलग बाजारों तक पहुंचाने में एयरपोर्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

यही वजह है कि जेवर को उत्तर भारत के संभावित लॉजिस्टिक्स हब के रूप में भी देखा जा रहा है।

सेमीकंडक्टर से मेडटेक तक तैयार हो रहा इकोसिस्टम

जेवर के आसपास YEIDA क्षेत्र में सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़ी परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। HCL-Foxconn का करीब 3,700 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट डिस्प्ले ड्राइवर चिप निर्माण की दिशा में काम कर रहा है।

इसके अलावा एयरपोर्ट के पास करीब 350 एकड़ में मेडटेक हब विकसित किया जा रहा है। यहां मेडिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों के आने की उम्मीद है।

एविएशन सेक्टर में MRO यानी मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल से जुड़ी सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं। यानी जेवर के आसपास सिर्फ एयरपोर्ट नहीं, बल्कि एयरपोर्ट आधारित पूरा औद्योगिक नेटवर्क तैयार करने की कोशिश हो रही है।

सबसे बड़ी चुनौती है कनेक्टिविटी

जेवर के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी लोकेशन और कनेक्टिविटी है। दिल्ली के मध्य हिस्सों से जेवर पहुंचने में IGI एयरपोर्ट की तुलना में अधिक समय लग सकता है।

शुरुआती दौर में यात्रियों की संख्या और उड़ानों से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। ऐसे में एयरपोर्ट की सफलता केवल टर्मिनल और रनवे की क्षमता से तय नहीं होगी। मजबूत सड़क और एक्सप्रेसवे कनेक्टिविटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

3,630 करोड़ के ग्रीनफील्ड कॉरिडोर से बदलेगी तस्वीर?

केंद्र सरकार ने करीब 3,630 करोड़ रुपये की लागत वाले ग्रीनफील्ड कॉरिडोर को मंजूरी दी है। करीब 31 किलोमीटर लंबा यह कॉरिडोर जेवर को दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से जोड़ने की योजना का हिस्सा है।

इससे एयरपोर्ट को ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर से बेहतर कनेक्टिविटी मिलने की उम्मीद है।

अगर यह नेटवर्क प्रभावी तरीके से विकसित होता है तो जेवर सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एयरपोर्ट नहीं रहेगा। यह दिल्ली-NCR के लिए एक बड़ा एयर ट्रांसपोर्ट और कार्गो हब बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

क्या रूसी विमानों की लैंडिंग सिर्फ शुरुआत है?

BRICS Summit के दौरान रूसी सैन्य विमानों का जेवर पर उतरना इस एयरपोर्ट की बढ़ती भूमिका की शुरुआती झलक माना जा सकता है। हालांकि, अभी यहां नियमित कमर्शियल इंटरनेशनल पैसेंजर फ्लाइट शुरू होना बाकी है।

दूसरी तरफ एयर कार्गो, सेमीकंडक्टर, मेडिकल डिवाइस और एविएशन सेक्टर से जुड़ी परियोजनाएं जेवर के आसपास एक बड़े औद्योगिक नेटवर्क की नींव रख रही हैं।

भारत की सप्लाई चेन का बड़ा केंद्र बन सकता है जेवर

जेवर की कहानी सिर्फ एक नए एयरपोर्ट के निर्माण तक सीमित नहीं है। असली महत्व उस औद्योगिक क्षेत्र का है जो इसके आसपास विकसित हो रहा है।

अगर एयरपोर्ट की क्षमता के साथ इंडस्ट्री, कार्गो और कनेक्टिविटी भी तेजी से जमीन पर उतरती है, तो जेवर आने वाले वर्षों में उत्तर भारत की सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।

रूस के विमानों की लैंडिंग इस संभावित बदलाव की सिर्फ एक झलक है। अब असली परीक्षा यह होगी कि जेवर का रनवे, आसपास की इंडस्ट्री और मजबूत होती कनेक्टिविटी मिलकर इसे कितना बड़ा वैश्विक एविएशन हब बना पाती है।

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