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Tuesday, July 21, 2026
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मुरादाबाद में रुचि वीरा-कमाल अख्तर विवाद, सपा में बढ़ी सियासी तकरार

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी में मुरादाबाद को लेकर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ गई है। सांसद रुचि वीरा और वरिष्ठ विधायक कमाल अख्तर के बीच बढ़ा विवाद अब पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव तक पहुंच चुका है, जिससे संगठन की एकजुटता पर सवाल उठने लगे हैं।

मुरादाबाद से लखनऊ तक पहुंचा विवाद

समाजवादी पार्टी की मुरादाबाद सांसद रुचि वीरा पिछले कई दिनों से लखनऊ में डेरा डाले हुए हैं। सूत्रों के अनुसार उन्होंने पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात कर विधायक कमाल अख्तर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की। हालांकि पार्टी नेतृत्व फिलहाल कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता और पूरे मामले की जांच कराने का भरोसा दिया है।

अखिलेश यादव के सामने हुई तीखी बहस

बताया जा रहा है कि बैठक के दौरान रुचि वीरा और कमाल अख्तर आमने-सामने आ गए। दोनों नेताओं के बीच काफी देर तक तीखी बहस हुई। अखिलेश यादव ने दोनों पक्षों की बातें सुनीं और मामले को शांत कराने की कोशिश की। फिलहाल पार्टी नेतृत्व इस विवाद को बढ़ने से रोकने के लिए संतुलित रुख अपनाए हुए है।

मुरादाबाद में रुचि वीरा-कमाल अख्तर विवाद, सपा में बढ़ी सियासी तकरार

कमाल अख्तर ने लगाए गंभीर आरोप

कमाल अख्तर ने पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी बात रखते हुए आरोप लगाया कि सांसद बनने के बाद रुचि वीरा ने पार्टी के पुराने नेताओं से दूरी बना ली। उनका कहना था कि पूर्व सांसद डॉ. एस.टी. हसन, विधायक नवाब जान और नासिर कुरैशी जैसे नेताओं को लगातार नजरअंदाज किया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि रुचि वीरा अब अपनी बेटी स्वाति वीरा को विधानसभा चुनाव लड़ाने की तैयारी कर रही हैं और इसी वजह से संगठन पर दबाव बनाने की राजनीति कर रही हैं।

रुचि वीरा क्यों हैं नाराज़?

सूत्रों के मुताबिक रुचि वीरा पार्टी की पीडीए बैठकों में खुद को नजरअंदाज किए जाने से नाराज हैं। उनका मानना है कि सांसद होने के बावजूद उन्हें संगठनात्मक कार्यक्रमों में पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। इसी वजह से उन्होंने पार्टी नेतृत्व से हस्तक्षेप कर कार्रवाई की मांग की है।

2027 चुनाव से पहले बढ़ी सियासी चुनौती

समाजवादी पार्टी के लिए यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। मुरादाबाद जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र में नेताओं के बीच बढ़ती खींचतान विपक्ष को भी हमला करने का मौका दे सकती है। पार्टी नेतृत्व की सबसे बड़ी चुनौती अब संगठनात्मक एकता बनाए रखने और स्थानीय असंतोष को समय रहते दूर करने की होगी।

आगे क्या होगा?

फिलहाल अखिलेश यादव ने किसी भी पक्ष के खिलाफ तत्काल कार्रवाई नहीं की है। माना जा रहा है कि जांच रिपोर्ट और दोनों नेताओं से विस्तृत बातचीत के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि समाजवादी पार्टी इस विवाद को संगठनात्मक अनुशासन के जरिए सुलझा पाती है या यह मामला चुनावी राजनीति पर भी असर डालता है।

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