केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के हालिया बयान ने पंजाब की राजनीति में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। संसद में करीब 17 साल का लंबा कार्यकाल पूरा करने के बाद उन्होंने संकेत दिया है कि अब उनका रुझान पंजाब की राजनीति की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि वह राज्य विधानसभा चुनाव में उतरकर सीधे जनता के बीच काम करना चाहते हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब उनका राज्यसभा कार्यकाल इसी महीने के अंत में समाप्त होने जा रहा है, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर कई तरह की अटकलें तेज हो गई हैं।
दिल्ली से पंजाब वापसी की इच्छा
बिट्टू ने स्पष्ट रूप से कहा कि दिल्ली में लंबे समय तक रहने के बाद अब उनका मन पंजाब की जमीनी राजनीति में लौटने का है। उन्होंने कहा कि 17 साल तक लोकसभा और राज्यसभा में रहने के बाद अब वे चाहते हैं कि पंजाब के गांवों और गलियों में जाकर लोगों के लिए काम करें। भाजपा के नव नियुक्त पंजाब अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों के पदभार ग्रहण समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी का पूरा नेतृत्व पंजाब की सेवा के लिए तैयार है और अब समय है जनता के बीच जाकर काम करने का।

राजनीतिक संकेतों ने बढ़ाई अटकलें
बिट्टू के बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि वह पंजाब विधानसभा चुनाव किस सीट से लड़ सकते हैं। राजनीतिक हलकों में उनके इस कदम को भाजपा की पंजाब रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। बिट्टू कांग्रेस के टिकट पर पहले तीन बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं, इसलिए उनका अनुभव और राजनीतिक पकड़ मजबूत मानी जाती है। वहीं उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा ने उन्हें चुनाव हारने के बावजूद केंद्रीय मंत्री बनाया, जो उनके राजनीतिक कद को और मजबूत करता है।
विपक्ष का हमला और मान सरकार की प्रतिक्रिया
उनके बयान पर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा नेता जल्द ही अपना मंत्री पद और राज्यसभा सीट दोनों खो सकते हैं। मान ने यह भी कहा कि भाजपा अब नेताओं को विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी क्षमता साबित करने के लिए कह रही है। दूसरी ओर, बिट्टू के बयान के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खेमों में राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है और आने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों को लेकर माहौल और गर्म होता दिख रहा है।
राजनीतिक भविष्य पर बढ़ी नजरें
पंजाब विधानसभा चुनाव अगले साल की शुरुआत में होने हैं और ऐसे में बिट्टू के बयान को बेहद अहम माना जा रहा है। उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वह वास्तव में दिल्ली की राजनीति छोड़कर पंजाब की जमीनी लड़ाई में उतरेंगे या यह केवल एक रणनीतिक संकेत है।

