समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक मतभेद लंबे समय से बने हुए हैं। कांग्रेस का आधिकारिक रुख व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का समर्थन करता है, लेकिन संबंधित समुदायों की भागीदारी और सहमति पर जोर देता है। पार्टी व्यापक सहमति के बिना समान संहिता लागू करने पर सवाल उठाती है।
UCC को लेकर कांग्रेस का मूल रुख क्या है?
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य अलग-अलग धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों की जगह नागरिक मामलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कही गई है।
कांग्रेस UCC के विचार पर अपने विरोध को मुख्य रूप से इसके लागू करने के तरीके और व्यापक सहमति की आवश्यकता से जोड़ती है। पार्टी का कहना है कि व्यक्तिगत कानूनों में सुधार किए जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए संबंधित समुदायों की भागीदारी और सहमति जरूरी है।
21वें विधि आयोग की रिपोर्ट का देती है हवाला
कांग्रेस अपने तर्क में 21वें विधि आयोग की 2018 की ‘Reform of Family Law’ परामर्श रिपोर्ट का हवाला देती रही है। आयोग ने उस समय कहा था कि मौजूदा चरण में UCC न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय, तथा व्यक्तिगत कानूनों में भेदभावपूर्ण प्रावधानों को दूर करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
आयोग ने परिवार कानूनों में सुधार के लिए देश की सांस्कृतिक विविधता और अलग-अलग समुदायों की परिस्थितियों को ध्यान में रखने पर जोर दिया था। हालांकि, यह 2018 की 21वें विधि आयोग की स्थिति थी; बाद में 22वें विधि आयोग ने UCC पर दोबारा विचार-विमर्श किया और 2023 में सार्वजनिक नोटिस जारी किया था।
व्यक्तिगत कानूनों में सुधार के पक्ष में कांग्रेस
कांग्रेस के 2024 के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र ‘न्याय पत्र’ में पार्टी ने कहा था कि वह व्यक्तिगत कानूनों में सुधार को प्रोत्साहित करेगी। घोषणापत्र में यह भी कहा गया कि ऐसे सुधार संबंधित समुदायों की भागीदारी और सहमति के साथ किए जाने चाहिए।
पार्टी ने अल्पसंख्यकों के लिए पहनावे, भोजन, भाषा और व्यक्तिगत कानूनों के चुनाव की स्वतंत्रता की बात भी कही थी। साथ ही ऐसे कानूनों को हटाने का वादा किया गया था जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप करते हैं।

कांग्रेस पूर्ण एकरूपता की जगह सुधार की बात करती है
कांग्रेस के तर्क का एक प्रमुख हिस्सा यह है कि भारत में धार्मिक समुदायों के भीतर भी अलग-अलग सामाजिक और सांस्कृतिक समूह हैं। इसलिए पार्टी व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों को बदलने की बात करती है, लेकिन सभी समुदायों पर एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करने को अलग विषय मानती है।
पार्टी के आधिकारिक दस्तावेज में UCC को लागू करने की प्रतिबद्धता के बजाय व्यक्तिगत कानूनों में समुदायों की भागीदारी और सहमति से सुधार की बात कही गई है।
बीजेपी पर कांग्रेस का राजनीतिक आरोप
कांग्रेस के कुछ नेता UCC के मुद्दे को राजनीतिक ध्रुवीकरण से जोड़कर देखते हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता शकील अहमद खान समेत पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया है कि बीजेपी UCC के जरिए जनता से जुड़े दूसरे मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश करती है।
हालांकि, यह राजनीतिक आरोप कांग्रेस नेताओं की राय है। बीजेपी UCC को अपने प्रमुख नीतिगत मुद्दों में शामिल करती रही है और इसे समान नागरिक अधिकारों से जुड़े विषय के रूप में प्रस्तुत करती है। इसलिए UCC पर दोनों दलों की राजनीतिक व्याख्या अलग-अलग है।
उत्तराखंड मॉडल पर भी कांग्रेस के सवाल
कांग्रेस ने उत्तराखंड में लागू किए गए UCC के मॉडल को लेकर भी आपत्तियां उठाई हैं। पार्टी का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में व्यक्तिगत कानूनों और सामाजिक परंपराओं को लेकर परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।
इसलिए कांग्रेस का कहना है कि किसी एक मॉडल को पूरे देश में लागू करने से पहले व्यापक चर्चा और संबंधित समुदायों की भागीदारी जरूरी है।
हालांकि, उत्तराखंड का UCC लागू होना और उसके प्रावधानों की कानूनी स्थिति अलग विषय है। कांग्रेस की आपत्तियां उस मॉडल और उसके राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव को लेकर पार्टी का दृष्टिकोण हैं।
UCC पर असली विवाद किन मुद्दों का है?
UCC की बहस को broadly तीन सवालों में समझा जा सकता है—क्या व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की जरूरत है, क्या सुधार अलग-अलग समुदायों के साथ चर्चा करके किए जाएं और क्या सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू किया जाए।
कांग्रेस पहले दो मुद्दों पर व्यक्तिगत कानूनों में सुधार और समुदायों की भागीदारी की बात करती है, जबकि पूर्ण UCC को वर्तमान परिस्थितियों में आवश्यक नहीं मानती। दूसरी ओर, UCC के समर्थक इसे नागरिक मामलों में समान कानूनी व्यवस्था से जोड़ते हैं।
निष्कर्ष
UCC पर कांग्रेस की आपत्तियां मुख्य रूप से इसकी आवश्यकता, लागू करने के तरीके और व्यापक सहमति से जुड़ी हैं। पार्टी के 2024 के घोषणापत्र में व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का समर्थन किया गया, लेकिन संबंधित समुदायों की भागीदारी और सहमति को जरूरी बताया गया। वहीं, कांग्रेस 21वें विधि आयोग की 2018 की स्थिति का भी हवाला देती है।

