बिहार में बाढ़ से लाखों लोगों की परेशानी के बीच सियासत भी तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप लगाते हुए राहत कार्य तेज करने की मांग की। वहीं दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना को उन्होंने बेहद गंभीर बताते हुए ‘हत्या’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया।
बाढ़ से लाखों लोग प्रभावित
अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा कि सरकार को बाढ़ प्रभावित लोगों के दुख-दर्द में उनके साथ खड़ा होना चाहिए। उनके मुताबिक, बिहार के 14 जिलों में 40 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हैं। ऐसे हालात में प्रभावित परिवारों तक राहत और जरूरी सहायता पहुंचाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
कई नदियां खतरे के निशान से ऊपर
बिहार में बाढ़ की स्थिति कई इलाकों में चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। गंडक, कोसी, बूढ़ी गंडक, गंगा, पुनपुन, बागमती और घाघरा समेत कई नदियां अलग-अलग स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। ऐसे में निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के सामने विस्थापन और रोजमर्रा की जरूरतों का संकट खड़ा हो सकता है।

सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप
कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि सरकार लोगों की तकलीफ को नजरअंदाज कर रही है। उन्होंने कहा कि बाढ़ पीड़ितों को सिर्फ प्रशासनिक घोषणाओं की नहीं, बल्कि जमीन पर प्रभावी मदद की जरूरत है। राहत शिविर, भोजन, दवाइयां और सुरक्षित स्थान तक पहुंच जैसी सुविधाएं संकट की घड़ी में बेहद महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
सत्य निकेतन हादसे पर तीखी प्रतिक्रिया
दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना पर भी अखिलेश प्रसाद सिंह ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने हादसे को ‘एक तरह की हत्या’ बताते हुए जिम्मेदारी तय करने की जरूरत पर जोर दिया। उनके बयान से साफ है कि वह इस घटना को केवल दुर्घटना मानने के बजाय जवाबदेही के सवाल से जोड़कर देख रहे हैं।
‘छात्रों की गूंज’ पर भी सियासी वार
राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘झूठ की गूंज’ बताए जाने के सवाल पर कांग्रेस सांसद ने बीजेपी पर निशाना साधा। उन्होंने सत्ता पक्ष के रुख पर सवाल उठाते हुए बिहार की राजनीति में जारी आरोप-प्रत्यारोप का भी जिक्र किया।
बाढ़ के बीच बढ़ी राजनीतिक गर्मी
बिहार में एक ओर नदियों का बढ़ता जलस्तर लोगों के लिए चुनौती बना हुआ है, तो दूसरी ओर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो रही है। सरकार और विपक्ष के बीच आरोपों का दौर ऐसे समय चल रहा है, जब प्रभावित परिवारों को तत्काल मदद की जरूरत है। आखिरकार जनता के लिए इस वक्त सबसे अहम सवाल यही है कि राजनीति से आगे बढ़कर राहत जमीन पर कितनी तेजी से पहुंचती है।

