पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले बंदी सिखों की रिहाई का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कौमी इंसाफ मोर्चा के आंदोलनों के बीच अब कांग्रेस नेता चरणजीत सिंह चन्नी और गुरकीरत सिंह कोटली ने भी रिहाई की मांग का समर्थन किया है।
चुनाव से पहले फिर उठा पुराना मुद्दा
पंजाब की राजनीति में बंदी सिखों की रिहाई का मुद्दा एक बार फिर जोर पकड़ रहा है। विधानसभा चुनाव से पहले सिख संगठनों की ओर से गठित कौमी इंसाफ मोर्चा लगातार इस मांग को लेकर सक्रिय है।
चंडीगढ़ में प्रदर्शन और घेराव की अलग-अलग कॉल के बीच अब राजनीतिक दलों के नेता भी इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने लगे हैं।
चन्नी ने सरकार से फैसला लेने को कहा
जालंधर से कांग्रेस सांसद और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने बंदी सिखों की रिहाई की मांग का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने सिख कैदियों की रिहाई के रास्ते में कभी बाधा नहीं डाली।

चन्नी ने सरकार से अपील की कि इस मामले में जल्द फैसला लिया जाए। उनका कहना है कि लंबे समय से लंबित इस संवेदनशील विषय को अनावश्यक रूप से खींचने के बजाय इसका समाधान किया जाना चाहिए।
कोटली ने भी रखी परिवार की स्थिति
चन्नी की रैली के दौरान कांग्रेस के पूर्व विधायक और मंत्री गुरकीरत सिंह कोटली ने भी इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण बयान दिया। वह पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं।
कोटली ने कहा कि बेअंत सिंह का पूरा परिवार बंदी सिखों की रिहाई में बाधा नहीं बनेगा। उन्होंने यहां तक कहा कि यदि किसी औपचारिक सहमति की जरूरत होती है तो परिवार लिखित रूप से अपनी सहमति देने के लिए तैयार है।
‘रिहाई से हमें कोई आपत्ति नहीं’
गुरकीरत सिंह कोटली ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका परिवार बंदी सिखों की रिहाई का विरोध नहीं करता। उनके मुताबिक, यदि रिहाई की प्रक्रिया में परिवार की सहमति जरूरी है तो वह इसे लिखित रूप में देने के लिए तैयार हैं।
यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बेअंत सिंह की हत्या से जुड़ा इतिहास पंजाब की राजनीति और सिख समुदाय के बीच लंबे समय से संवेदनशील विषय रहा है।
कौमी इंसाफ मोर्चा भी लगातार सक्रिय
दूसरी ओर कौमी इंसाफ मोर्चा बंदी सिखों की रिहाई की मांग को लेकर अपना आंदोलन जारी रखे हुए है। संगठन की ओर से चंडीगढ़ में कभी पंजाब गवर्नर हाउस तो कभी मुख्यमंत्री आवास के घेराव की कॉल दी जाती रही है।
संगठन का तर्क है कि जिन कैदियों की निर्धारित सजा पूरी हो चुकी है, उनकी रिहाई पर सरकार को स्पष्ट और समयबद्ध फैसला लेना चाहिए।
राजनीतिक संदेश भी महत्वपूर्ण
चन्नी और कोटली के बयानों को पंजाब की चुनावी राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। सिख समुदाय से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक दलों की स्थिति चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, बंदी सिखों की रिहाई का मामला केवल राजनीतिक नहीं है। इसमें कानूनी प्रक्रिया, संबंधित सरकारों के अधिकार क्षेत्र और प्रत्येक मामले की अलग-अलग परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अब सरकार के फैसले पर नजर
चरणजीत सिंह चन्नी ने साफ कहा है कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए और सरकार को जल्द समाधान की दिशा में कदम उठाना चाहिए।
बंदी सिखों की रिहाई का सवाल पंजाब में लंबे समय से भावनाओं, कानून और राजनीति के बीच उलझा हुआ है। चुनाव से पहले इस मुद्दे का फिर उभरना बताता है कि इसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव कितना गहरा है। अब देखना होगा कि सरकार इस बढ़ते दबाव के बीच क्या फैसला लेती है और क्या कोई ठोस समाधान सामने आता है।

