प्रस्तावित हजूर साहिब एक्ट-2026 को लेकर उठे विवाद के बीच महाराष्ट्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस कानून को विधानसभा में पेश करने से पहले सिख धार्मिक संगठनों, विद्वानों, विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श किया जाएगा। सरकार का कहना है कि किसी भी नए विधायी ढांचे को अंतिम रूप देने से पहले सभी संबंधित पक्षों की राय लेना आवश्यक है, ताकि धार्मिक भावनाओं और परंपराओं का पूरा सम्मान किया जा सके।
भाजपा पंजाब अध्यक्ष ने फैसले का किया स्वागत
महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले का भाजपा पंजाब के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि तख्त श्री हज़ूर साहिब से जुड़ा कोई भी कानून बनाने से पहले सिख पंथ और धार्मिक संस्थाओं की राय लेना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार यह केवल एक प्रशासनिक या कानूनी विषय नहीं, बल्कि करोड़ों सिख श्रद्धालुओं की आस्था और धार्मिक विरासत से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है।
ढिल्लों ने कहा कि सरकार द्वारा परामर्श की प्रक्रिया अपनाना सकारात्मक कदम है और इससे सिख समुदाय का विश्वास और अधिक मजबूत होगा।

धार्मिक भावनाओं के सम्मान पर दिया जोर
केवल सिंह ढिल्लों ने बताया कि इस विषय पर हुई उच्चस्तरीय बैठक में उन्होंने टेलीफोन के माध्यम से भी अपनी बात रखी। उन्होंने आग्रह किया कि किसी भी नए कानून को लागू करने से पहले सिख समुदाय, धार्मिक संस्थाओं और विद्वानों के साथ विस्तृत संवाद किया जाए। उनका मानना है कि इस प्रक्रिया से ऐसा कानून तैयार किया जा सकेगा, जो धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक महत्व का सम्मान करते हुए सभी पक्षों की अपेक्षाओं पर खरा उतरे।
उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने सिख समुदाय की चिंताओं को गंभीरता से सुना है। यह निर्णय तख्त श्री हज़ूर साहिब की पवित्रता और आध्यात्मिक महत्व के प्रति सरकार की संवेदनशीलता को दर्शाता है।
समिति की सिफारिशों के बाद बनेगा अंतिम मसौदा
सरकार द्वारा गठित समिति अब विभिन्न सिख संगठनों, धार्मिक नेताओं और विशेषज्ञों से सुझाव लेगी। इन सुझावों के आधार पर प्रस्तावित हजूर साहिब एक्ट-2026 का अंतिम मसौदा तैयार किया जाएगा। केवल सिंह ढिल्लों ने विश्वास जताया कि भविष्य में जो भी विधायी ढांचा सामने आएगा, वह पूरे सिख समुदाय की भावनाओं, विश्वास और सम्मान के अनुरूप होगा।
उन्होंने कहा कि धार्मिक मामलों में संवाद और सहमति का रास्ता ही सबसे बेहतर विकल्प है। इससे अनावश्यक विवादों से बचा जा सकेगा और सभी पक्षों का विश्वास भी कायम रहेगा।

