मध्य प्रदेश पुलिस विभाग में पिछले कुछ दिनों के दौरान सामने आई आत्महत्या से जुड़ी घटनाओं ने प्रशासन और सरकार दोनों की चिंता बढ़ा दी है। महज 12 दिनों के भीतर कई पुलिसकर्मियों की असामयिक मौत के मामलों ने पुलिस बल के भीतर मानसिक स्वास्थ्य, कार्यस्थल के दबाव और व्यक्तिगत चुनौतियों को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। ताजा मामला ग्वालियर जिले के डबरा क्षेत्र से सामने आया, जहां आरक्षक राघवेंद्र तोमर अपने सरकारी आवास में मृत पाए गए। घटना की जानकारी मिलते ही वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और जांच शुरू कर दी गई। पुलिस विभाग में लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कानून-व्यवस्था संभालने वाले पुलिसकर्मी खुद किन परिस्थितियों और दबावों से गुजर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिसकर्मियों को अक्सर लंबे कार्य घंटे, पारिवारिक जिम्मेदारियां और नौकरी से जुड़ा तनाव झेलना पड़ता है, जिसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
ग्वालियर की घटना ने फिर खींचा ध्यान
जानकारी के अनुसार राघवेंद्र तोमर मूल रूप से मुरैना जिले के पोरसा क्षेत्र के निवासी थे और पिछले लगभग एक वर्ष से डबरा सिटी थाने में पदस्थ थे। घटना से पहले उन्होंने अपने परिवार से संपर्क किया था, जिसके बाद परिजनों को चिंता हुई और उन्होंने साथियों को इसकी सूचना दी। जब पुलिसकर्मी उनके सरकारी आवास पहुंचे तो वह मृत अवस्था में मिले। इसके बाद पुलिस और फोरेंसिक टीम ने मौके का निरीक्षण किया और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू की। राघवेंद्र तोमर को अनुकंपा नियुक्ति मिली थी और उनके परिवार में पत्नी तथा दो छोटे बच्चे हैं। इस घटना ने न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे पुलिस विभाग को झकझोर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि मामले के सभी पहलुओं की जांच की जा रही है और परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया जा रहा है ताकि सच्चाई सामने आ सके।

अलग-अलग जिलों से सामने आए दर्दनाक मामले
ग्वालियर की घटना से पहले भी प्रदेश के कई जिलों से इसी तरह की खबरें सामने आई थीं। मंडला जिले में एक आरक्षक की मौत के मामले में जांच के दौरान कथित ब्लैकमेलिंग का एंगल सामने आया, जिसके बाद पुलिस ने कुछ आरोपियों को गिरफ्तार किया। वहीं गुना जिले में एक महिला आरक्षक अपने सरकारी आवास में मृत पाई गई थीं। छिंदवाड़ा में महिला प्रधान आरक्षक दीपा नेगी की मौत का मामला भी चर्चा में रहा, जहां बताया गया कि वह लंबे समय से मानसिक तनाव और अवसाद का उपचार ले रही थीं। इसके अलावा उमरिया जिले में एक सब-इंस्पेक्टर की मौत ने भी पूरे विभाग को स्तब्ध कर दिया था। इन घटनाओं की परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन एक समान बात यह है कि सभी मामलों ने पुलिसकर्मियों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यही कारण है कि अब इन घटनाओं को केवल व्यक्तिगत मामलों के रूप में नहीं बल्कि एक व्यापक संस्थागत चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य पर फोकस की मांग तेज
लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद पुलिस विभाग में काउंसलिंग व्यवस्था को मजबूत करने की मांग जोर पकड़ रही है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिसकर्मियों के लिए नियमित मानसिक स्वास्थ्य जांच, मनोवैज्ञानिक सहायता और तनाव प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। पुलिस की नौकरी में अक्सर अत्यधिक दबाव, संवेदनशील मामलों की जांच, लंबे समय तक ड्यूटी और पारिवारिक जीवन के लिए सीमित समय जैसी चुनौतियां शामिल होती हैं। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संस्थागत समर्थन बेहद आवश्यक हो जाता है। वरिष्ठ अधिकारियों का भी मानना है कि समय रहते तनाव और अवसाद के संकेतों की पहचान कर सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है। फिलहाल प्रदेश में सामने आए सभी मामलों की जांच जारी है, लेकिन इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस बल की कार्यक्षमता और कल्याण के लिए मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना समय की बड़ी आवश्यकता बन चुका है।

