उत्तर प्रदेश सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से पहले ओबीसी आरक्षण को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने “उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग” के गठन को स्वीकृति दे दी है। इस आयोग का मुख्य उद्देश्य पंचायत स्तर पर अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण की स्थिति का अध्ययन करना और उसकी वास्तविक सामाजिक व जनसंख्या आधारित समीक्षा करना होगा। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही भविष्य में पंचायत चुनावों में आरक्षण का निर्धारण किया जाएगा। इस फैसले को राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आयोग की संरचना और कार्यप्रणाली
सरकार द्वारा गठित यह पांच सदस्यीय आयोग पंचायतों में ओबीसी आरक्षण की प्रकृति, प्रभाव और वर्तमान सामाजिक स्थिति का विस्तृत अध्ययन करेगा। आयोग में एक सदस्य उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे जिन्हें इसका अध्यक्ष बनाया जाएगा। इसके अलावा अन्य सदस्य उन विशेषज्ञों में से चुने जाएंगे जिन्हें पिछड़ा वर्ग से जुड़े मामलों का गहन अनुभव और ज्ञान हो। आयोग को पंचायतवार आरक्षण का वैज्ञानिक और अनुपातिक मॉडल तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है, ताकि आरक्षण व्यवस्था अधिक पारदर्शी और संवैधानिक मानकों के अनुरूप हो सके।
कैबिनेट बैठक में लिए गए अहम निर्णय
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में सोमवार को पांच कालिदास मार्ग स्थित उनके आवास पर हुई कैबिनेट बैठक में कुल 12 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। इनमें सबसे प्रमुख प्रस्ताव पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए समर्पित आयोग के गठन का रहा। वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने जानकारी देते हुए बताया कि आयोग का उद्देश्य ग्रामीण निकायों में पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति का अनुभवजन्य अध्ययन करना है। यह आयोग आरक्षण व्यवस्था को संवैधानिक कसौटी पर परखते हुए एक मजबूत वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगा।
ट्रिपल टेस्ट और आरक्षण व्यवस्था का भविष्य
प्रदेश में पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत स्तर पर आरक्षण की व्यवस्था पहले से ही उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम 1947 और क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम 1961 के तहत लागू है। संविधान के अनुच्छेद 243-घ के अनुसार राज्य सरकार को आरक्षण तय करने का अधिकार प्राप्त है। सरकार अब इस पूरी प्रक्रिया को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित “ट्रिपल टेस्ट” के आधार पर लागू करना चाहती है, ताकि किसी भी प्रकार की कानूनी चुनौती से बचा जा सके। आयोग छह माह में अपनी रिपोर्ट सौंपेगा, जिसके बाद पंचायत चुनावों में आरक्षण की नई तस्वीर तय होगी।

