केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान को मानहानि के एक बड़े मामले में आखिरकार राहत मिल गई है। उनके खिलाफ दायर सिविल और आपराधिक दोनों मानहानि मुकदमे अब पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे। मंगलवार तीन फरवरी को सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी गई कि शिवराज सिंह चौहान और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा के बीच आपसी सुलह हो गई है। इस सुलह के बाद लंबे समय से चल रहा यह हाई प्रोफाइल कानूनी विवाद समाप्त हो गया। इस फैसले को राजनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने दर्ज किया समझौता
जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस एन के सिंह की पीठ ने दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते को रिकॉर्ड पर लेते हुए शिवराज सिंह चौहान की याचिका का निपटारा कर दिया। शिवराज सिंह चौहान ने अपने खिलाफ दर्ज मानहानि के मामलों को रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। पिछले साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सलाह दी थी कि वे आपसी सहमति से विवाद सुलझाने का प्रयास करें। उसी सलाह के बाद बातचीत का रास्ता खुला और आखिरकार संसद परिसर में दोनों नेताओं के बीच सहमति बन गई।
पंचायत चुनाव और ओबीसी आरक्षण से जुड़ा था विवाद
यह पूरा मामला वर्ष दो हजार इक्कीस में हुए मध्य प्रदेश पंचायत चुनावों से जुड़ा था। उस समय विवेक तन्खा सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण से संबंधित एक अहम मामले में वरिष्ठ वकील के रूप में पेश हो रहे थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस विषय पर कुछ सार्वजनिक बयान दिए थे। विवेक तन्खा का आरोप था कि शिवराज सिंह चौहान ने पंचायत चुनावों पर रोक के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया और सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों को गलत तरीके से पेश किया। तन्खा का कहना था कि इन बयानों से उनकी पेशेवर छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा और उन्हें सार्वजनिक आलोचना का सामना करना पड़ा।
मामले की वापसी और कानूनी कार्यवाही का अंत
इन्हीं आरोपों के आधार पर विवेक तन्खा ने सिविल और आपराधिक मानहानि के मामले दर्ज कराए थे। सिविल केस में उन्होंने दस करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की थी। वहीं आपराधिक मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा पांच सौ के तहत कार्यवाही की मांग की गई थी। शिवराज सिंह चौहान की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने बताया कि दोनों पक्ष संसद में मिले और आपसी सहमति से विवाद सुलझा लिया गया। इसके बाद विवेक तन्खा ने दोनों मामले वापस ले लिए। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब शिकायतकर्ता ने आरोप वापस ले लिए हैं तो आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

